स्नेहा चौहान.  ये नीलाभ की आखिरी पोस्ट थी,जिसमे और भी बहुत कुछ आगे बताने की बात कह के उन्होंने विराम दिया.उनको ये नहीं पता था कि ये विराम ही उनको उन सबसे अलग ला खड़ा करता है,जो आज ये साहस नहीं कर पाते,दुनिया के सामने खुद को खोलके रखने का दम, हर किसी की बस की बात नहीं.मैंने नीलाभ को नहीं पढ़ा ,ये अब कहना मुश्किल है,क्योंकि उनकी इस पोस्ट ने मुझे उन लोगो में शामिल कर लिया जो उनको जानते थे.ये अलग बात है अब आभासी दुनिया ही सही.उनको कई बार मेरे दोस्त राहुल पांडे की प्रोफाइल में देखा,आज जब उनके इस दुनिया से रुखसती की खबर सुनी,यकीन नहीं हुआ. नीलाभ आज आप जहा भी है,यकीनन सुकून की नींद में होंगे,क्योंकि आपने माफीनामा लिख के अपने आप को खाली कर लिया था. ये माफ़ी मांगने की आपकी अदा की मैं कायल हो गयी.बहुत कम लोग होते है,जिनमें ये हिम्मत होती है.अकेले में माफ़ी माँगना और दुनिया के सामने माफ़ी माँगना,दोनों दीगर बात है. बड़ी बात ये की साहित्यकार होते हुए आपने कितनी सिद्दत से अपनी गलतियों को स्वीकार कर लिया.साहित्यकार का अहम् मैंने देखा है.आपने उसपे विजयप्राप्त कर जो नयी मंज़िल को थामा है. उस पथ पे आप सुकून से अग्रसर हो. आभासी दुनिया में आपको एक घंटे पहले जानने वाली आपकी दोस्त.

नीलाभ सा दम है किसी में.

प्रायश्चित

इस माफ़ीनामे को शुरू करने से पहले ही मुझे शिद्दत से इस बात का एहसास है कि इसे सही तरह से लिख कर पेश करने में ख़ासी दुश्वारी होने वाली है. कुछ तो बातें ही ऐसी हैं कि काफ़ी उलझी हुई हैं और ऊपर से इसका ताल्लुक़ किसी एक व्यक्ति से नहीं है,  बल्कि यह एक समूचे सम्मानित परिवार के प्रति किये गये अशोभनीय व्यवहार से सम्बन्धित है.

बात को अनावश्यक रूप से लम्बा न खींच कर, संक्षेप में कहूं. जब जून 2013 में भूमिका और मेरी शादी हुई, तब भूमिका के पूरे परिवार, यहां तक उसकी मां को भी, इसकी जानकारी नहीं थी. मुझे तब यह एहसास नहीं था कि दुनिया में भूमिका के लिए उसकी मां देवी से भी ऊपर का दर्जा रखतीं हैं जैसा कि हर बच्चे के दिल में मां का रुतबा होता है. इसी तरह स्वाभाविक रूप से भूमिका की मां के लिए भी भूमिका से बढ़ कर दुनिया में कुछ भी नहीं है, और जब मैं यह कहता हूं कि नहीं है तो इसका मतलब है कि नहीं है. दोनों ही स्त्रियां मय अपने परिवार अपने संघर्ष में एक-दूसरे के साथ कुछ ऐसे जुड़ी रही हैं, जिसकी मिसाल दुर्लभ है.

ज़ाहिर है, जब विवाह के तीसरे दिन भूमिका की मां को पता चला तो पहली बार उन्हें ज़िन्दगी में अत्यन्त अप्रत्याशित धक्का लगा जो बिलकुल स्वाभाविक था.. जिस धक्के से वे आज तक उबर नहीं पायीं हैं. ऊपर से मेरा अतीत तमाम तरह की भूल-ग़लतियों और महान कलंकों से भरा हुआ था, जिससे भूमिका भी पूरी तरह अनभिज्ञ थी. तिस पर भी, जब मैं और भूमिका शादी के बाद इलाहाबाद गये तो मांजी (कि यही अपनी सास को मैं कहता हूं) मेरे सिविल लाइन्ज़ वाले दफ़्तर में भूमिका के भाई शिवम के साथ आयीं और अपने धक्के को कहीं अन्दर छुपा कर उन्होंने वहां सबके सामने मुझे शगुन दिया और एक सोने की अंगूठी भी. उसी यात्रा में मांजी ने भूमिका और सबकी सुख-शान्ति के लिए समयामाई के मन्दिर में सत्यनारायण की कथा भी करवाई.

> यहां यह भी बता दूं कि मेरे अतीत के उजागर होने के बाद ज़ाहिरा तौर पर मैं और मेरा काला अतीत भूमिका और मांजी के लिए दुख का एक स्थायी कारण तो बन ही गया है. तो भी भूमिका ने अपने प्रयत्नों और अपने बड़े नामी परिवार के रुतबे के चलते मेरे अतीत के अनेक विपत्तियां, कंलंक, झाड़-झंखाड़ साफ़ कर दिये. उस वक़्त भी मांजी इलाहाबाद की एक अत्यन्त प्रतिष्ठित शिक्षण-संस्था में वरिष्ठ अध्यापिका, और अपने विभाग की सर्वोच्च भी थीं.

इस बीच मैंने अंकुर विहार वाले मकान को अपनी इच्छा, सौजन्यता और भूमिका के प्रति प्रेम के कारण दो बार में उसके नाम कर दिया था. ताकि वह सम्पत्ति की दृष्टि से सुरक्षित रहे.

इस बीच मेरे बारम्बार के आग्रह को मान कर, ग्रीष्मावकाश में मांजी भूमिका से मिलने हमारे घर आयीं. जैसा मैंने कहा, मांजी के लिए भूमिका की ख़ुशी सर्वोपरि है. अब हुआ यह कि कभी जब वे भूमिका को दुखी देखें तो ख़ुद को रोक न पायें और मुझे कुछ बातें कह दिया करें. वे बातें कई बार बेहद कड़वी भी थी और असहनीय भी.

मैं यह स्वीकार करूंगा कि इन अब बातों को पूरी तरह समझ न पाने के कारण मैं बजाय मिल-बैठ कर बातें करने के, मन में पूर्वाग्रह पाल बैठा. और एक दिन अपने भतीजे सेतु और वाणी प्रकाशन के मालिक श्री अरुण माहेश्वरी के साथ योजना बना कर पांच कारों में अपने सामान बांध कर बिना बताये घर छोड़ कर निकल भागा. मैंने भूमिका से कहा, ये सामान अश्क-ग्रन्थावली के हैं जो सेतु और मैं वाणी प्रकाशन के दफ़्तर में रखने जा रहें हैं. जबकि मैंने वो सारे चुने हुए सामान अंकुर विहार से ले जा कर बुराड़ी में पहले से तय किराये के मकान पर रख दिये.

यह मेरी एक बड़ी भूल थी. चाहिए तो यह था कि मैं बैठ कर भूमिका और मांजी से बातें साफ़ कर लेता, घर के  मतभेदों को घर ही के अन्दर सुलझा लेता. पर अपने अविवेकी आवेग, कथित रूप से आहत अहम और नासमझी के चलते, मैंने बातों को सार्वजनिक रूप से गलत ढंग से व्यक्त किया. बार-बार व्यक्त किया, हर जगह कहा.

मेरे पलायन के बाद मेरा पता लगाने के लिए स्वाभाविक रूप से भूमिका ने थाने में एक रपट भी लिखायी थी कि मेरा अपहरण हो गया है. इसके जवाब में एक गृहस्थ की तरह व्यवहार करने की बजाय मैंने मांजी पर फ़िर से एक घृणित, झूठा और गन्दा आरोप लगाया कि वे मुझे जान से मारना चाहतीं हैं फिर जब मैं पुलिस की सहायता से अपनी कार वापस लेने गया तो बजाय मांजी का प्रस्ताव मानने के, कि हम ऊपर घर पर चल कर बैठ कर शिकायतें दूर कर लें, मैंने मुहल्ले भर के सामने एक अच्छा-ख़ासा अभद्र दृश्य उपस्थित किया. जिससे भूमिका का हाथ भी तोड़ बैठा. यही नहीं, आने वाले महीनों में मैं मांजी पर तमाम तरह के अनर्गल आरोप लगाता रहा कि वे और भूमिका मेरे मकान की इच्छुक थीं. जबकि स्थिति जैसा कि अब मैं सही जानने लगा हूं मांजी के लिए मेरा मकान मिट्टी से ज़्यादा कुछ नहीं है, वे सिर्फ़ एक चीज़ चाहती हैं -- हर क़ीमत पर भूमिका की ख़ुशी और यह कभी नहीं बदलने वाला. वे तो मेरे घर से भागते ही मेरे उस मकान से, जिसे मैं कानूनी रूप से भूमिका को दे चुका हूं, तत्काल छोड़ कर चलीं गयीं, और आज भी दिल्ली के नाम से ही भड़क उठतीं हैं.

पर यह तो अब की बात है. उस समय तो मैं तमाम तरह के अविवेकी पूर्वाग्रहों से भरा हुआ था.

मैंने यह तक न सोचा कि जब मेरी मां नहीं थी, और पदेन मेरी सास मेरी मां की जगह थीं तो मेरे इस व्यवहार ने उन्हें कितनी चोट पहुंची होगी. क्या उन्हें अपनी मां की जगह बैठाना और वही आदर देना उचित न होता? यह भी एह्सास मैं न कर पाया कि दुनिया की कोई भी मां ऐसा ही कहती और करती जैसा मांजी कह कर रही थीं, जब उनकी काबिल बेटी बिना उनसे पूछे और बिना बताये भी मुझ जैसे एक बदनाम वृद्ध से शादी कर लेती. वह बेटी जो रात आठ बजे के बाद हौस्टल से बाहर पांव नहीं निकालती थी और दिल्ली से दूर बैठी उसकी मां इस बात की त्स्दीक कर के ही सोने जाती थी. उसकी मां ने तो इस मेधावी बेटी को दिल्ली पढ़ने भी उसकी (पूर्व मन्त्री त्रिवेदी परिवार से) सगाई होने के बाद ही भेजा था.

मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि अगर मेरी मां ज़िन्दा होती और मैंने ऐसा व्यवहार किया होता तो उसने खड़े पैर मुझे घर से निकाल दिया होता.

मेरी मां कोई लम्बे-चौड़े क़द की औरत नहीं थी. मैंने उसे कभी ऊंचे स्वर में बोलते नहीं सुना. पर जो भी वह कह्ती थी अपने बेहद धीमे स्वर में इस्पात की-सी दृढ़ता से कहती थी. तेरह की उम्र मॆ अनाथ हो जाने वाली इस औरत को उसके देवता-तुल्य सबसे छोटे मामा ने पाला था और संस्कार दिये थे. विपदा और जीवन की कठिनाइयों से लड़ कर इस औरत ने सिर्फ़ १३ साल की उमर से दोबारा पढाई शुरू की, अपने जीवट से प्रधानाध्यापिका और फ़ौज में कमिशन्ड अफ़सर बनी, पति को टीबी की चंगुलों से छुडा लायी और कोई अनुभव न होते हुए भी हिन्दी की पहली महिला प्रकाशक बनी.

> इस क्रम में मेरी मां ने ज़िन्दगी के कुछ उसूल बनाये थे, जो वह कड़ाई से लागू करती थी और मुझे बचपन से सिखाती आयी थी. मसलन, अगर किसी ने तुम्हारे साथ तुम्हारे दुर्दिन में दुर्व्यवहार किया हो और संयोग से वह अपने दुर्दिन पर तुम्हारे दुआरे आये तो उसके साथ उपकार करने से बड़ा कोई प्रतिशोध नहीं, क्योंकि उसी के जैसा व्यवहार करना जलन को जीवित रखना है, जिससे कोई प्रतिशोध नहीं होता. या -- Even if you have to disagree, you must disagree in an agreeable way.(अगर आपको किसी से असहमत भी होना है तो सौजन्य-सम्मत परस्पर मनभावन तरीक़े से असहमत होना चाहिए)  या -- गल्ल आखदी ए तू मैन्नू मुहों कड्ड, मैं तैन्नू शहरों कड्डनी आं (बात कहती है तू मुझे मुंह से निकाल, मैं तुझे शहर से निकालती हूं). और अन्त में वह सुनहरा दोहा -- देखन को हरसें नहीं, नैनन नहीं सनेह, तुलसी वहां न जाइये, कंचन बरसें मेह.

अब पीछे देखते हुए मुझे हैरत होती है कि अपने अविवेकी आवेग में मैं यह सब कैसे भूल बैठा. क्या यह अपनी मां की स्मृति और सीख के प्रति ग़द्दारी नहीं थी, और अक्षम्य भी ?

> इससे से भी ज़्यादा वह अभद्र, अशोभनीय और अविवेकी व्यवहार था जो मैंने उस नि:स्पृह महिला के प्रति किया जिसे मैंने मांजी कहा था.

> विडम्बना देखिए कि जिसके प्रति मैंने यह अक्षम्य व्यवहार किया और उसके और उसकी जान से प्यारी बेटी के बीच दीवार बना, वह मेरी बीमारी में दूर बैठी दुर्गाकवच और कई विघ्नहर्ता पाठ कर रही है कि मैं स्वस्थ हो जाऊं, बेहतरीन खड़ाऊं भेज रही है कि मुझे नंगे पैर न चलना पड़े या असुविधापूर्ण जूते न पहनने पड़ें और यह सब इसलिए कि मांजी के लिए भूमिका की ख़ुशी केन्द्र में है और शायद भूमिका की ख़ुशी मैं हूं.

क्या यह मेरे लिए ज़मीन में गड़ जाने क़ाबिल नहीं ?

पर अक्षम्य अपराध, अक्षम्य होते हैं, उनका कोई दण्ड भी नहीं होता, सिवा अपराधी के पछतावे की आग में जलने के, क्योंकि जो अशोभनीयताएं हो चुकी है, उन्हें ब्लैक बोर्ड पर लिखे हुए की तरह मिटाया नहीं जा सकता. मैं मांजी से कई बार ज़बानी फोन पर माफ़ी मांग चुका हूं और हर बार उन्होंने यही कहा है कि वे मुझसे नाराज़ नहीं, पर मैं जानता हूं कि चोट मैंने उन्हें बेहिसाब पहुंचायी है.

चूंकि मैंने मांजी को चोट सार्वजनिक रूप से पहुंचायी है, इसलिए पछतावे और अपने अपराध-बोध का पहला तक़ाज़ा यही है कि मैं सार्वजनिक माफ़ी मांगूं और यह अर्ज़ी उनके चरणों में रख दूं. सो कर रहा हूं. इलाहाबाद जा कर भी मैं उन्हें मनाने की हरसम्भव कोशिश करूंगा. क्योंकि यह उन्हीं की बेटी और उन्हीं का दिया संस्कार है जो इस वक्त मेरी बुरी बीमारी और बुरे हाल में भी मेरा साथ दे रहा है, मेरी इतनी सेवा कर रहा है.

> आगे के क़दमों के बारे में मैं अभी कुछ सोच नहीं पाया हूं. मेरी मां की तरह मांजी का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है और वैसी ही इस्पाती दृढ़ता उनमें भी है. चुनांचे, यह अर्ज़ी उनके चरणों में पड़ी रहेगी.

वैसे मैं उनसे एकाधिक बार अनुरोध और आग्रह कर चुका हूं कि वे हमारे साथ आ कर रहें , लेकिन उन्होंने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया. कारण प्रकट है- मुझ पर उनका भरोसा टूट चुका है और टूटा भरोसा टूटे कांच की तरह होता है. समूचा कांच ही बदलना पड़ता है. मुझे खुद को ही बदलना पड़ेगा.

फ़िलहाल पहले क़दम के तौर पर यह सार्वजनिक क्षमा याचना पेश है. अगले क़दमों के बारे में सोचता रहूंगा.


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