आर्थिक समीक्षा 2014-15 में अनुसंधान, कृषि एवं खाद्य क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सिंचाई और भंडारण जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश की सिफारिश की गई है. इसके अलावा सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और कृषि उत्पादों के लिए एक राष्ट्रीय साझा बाजार बनाने का भी आह्वान किया गया है.

आर्थिक समीक्षा 2014-15 में कहा गया कि कृषि और खाद्य क्षेत्रों को अनुसंधान, शिक्षा, विस्तार, सिंचाई, उर्वरक तथा ताकि मृदा, जल तथा जिंसों के परीक्षण के लिए प्रयोगशालाओं और भंडारण एवं कोल्ड स्टोरेज में भारी निवेश करने की जरूरत है. समीक्षा में कहा गया कि सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और लाभ के प्रत्यक्ष हस्तांतरण के योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक ही सीमित रखने से सार्वजनिक निवेश के लिए अधिक संसाधन बचेगा. समीक्षा में कहा गया कि कृषि में सार्वजनिक व्यय खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी के मुकाबले सिर्फ एक चौथाई है. इसमें कहा गया ‘कृषि पर सार्वजनिक व्यय अब तक सब्सिडी के प्रावधानों पर केंद्रित रहा है और अब यह मौका है कि इसे उत्पादकता बढ़ाने के लिए निवेश पर केंद्रित किया जाए. समीक्षा के मुताबिक उच्च निवेश आवश्यक है क्योंकि राज्यों की पैदावार में काफी फर्क है. बेहतरीन राज्यों में भी विश्व की बेहतरीन जगहों के मुकाबले विभिनन फसलों में उपज काफी कम है.

इसमें कहा गया है कि इससे उपज का अंतराल पाटने के लिए उत्पाद बढ़ाने की अपार संभावना है. समीक्षा में कहा गया कि सरकार को राष्ट्रीय साझा बाजार बनान के लिए राज्यों को जोड़ने के हर संभव प्रयास करने चाहिए. साथ ही सरकार को सुझाव भी दिया कि यदि राज्य इसमें सहयोग नहीं करते तो संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग किया जाए. सर्वेक्षण के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम के कामकाज को भी में उल्लेखनीय बदलाव की जरूरत है और कहा कि एफसीआई के पुनर्गठन पर शांता कुमार समिति की सिफारिशें खाद्य नीति के भावी खाका तैयार करने के लिए उपयोगी सुझाव है. वित्त वर्ष 2014-15 के लिए सरकार ने कम बारिश के बावजूद कृषि के लिए 1.1 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि का अनुमान जाहिर किया है. इस साल अनाज उत्पादन 25.70 करोड़ टन रहने का अनुमान है जो पिछले साल के मुकाबले तीन प्रतिशत कम है.

सरकार का सार्वजनिक व्यय उपज बढ़ाने के लिए सब्सिडी प्रदान करने के बदले उपज बढ़ाने के लिए ज्यादा निवेश पर ध्यान केंद्रित है. हालांकि वैश्विक जिंस कीमतों में नरमी के कारण मुद्रास्फीति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं होगी लेकिन व्यापार की संभावना में नरमी किसानों की आय को प्रभावित कर सकती है जिससे किसानों को समर्थन प्रदान करने के लिए राजनीतिक दबाव और बढ़ेगा. सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की भूमिका पर पुनर्विचार करेगी और यदि जरूरत पड़ने पर इसके अनुसंधन, शिक्षा और विस्तार के कामों को अलग-अलग किया जाएगा.


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