एक कहानी थी बकरे और घोड़े की, दोनों एक ही किसान के थे. ये किसान लेकिन भारत का किसान नहीं था, कहीं अमरीका का था. लेकिन किसान तो किसान होता है, खेत भी थे उसके पास और वहां खेत जोतने के लिए बैल नहीं घोडा इस्तेमाल होता है. तो किसान अपने घोड़े से खेत जोतता था. किसी तरह एक दिन घोड़े के पैर में चोट आ गई और घोडा लंगड़ा कर चलने लगा. लंगड़ा घोडा भला किस काम का ? न तो उसपे सवारी की जा सकती है न ही उस से खेत जोते जा सकते हैं, किसान ने सोचा बेकार ये बैठा बैठा चना खाता है. वो अपने परिवार से बात करने लगा कि पैसे बचाने के लिए हमें इस घोड़े को गोली मार देनी चाहिए.

अब वहीँ कोने में खड़े बकरे ने ये बात सुन ली. अब लम्बे चौड़े खेत में बेचारे बकरे का एक ही दोस्त था वो घोडा ! जब तक किसान और उसका परिवार आपस में ये मसला निपटाते बकरा भागा भागा गया घोड़े के पास. उसे समझाया, देखो दोस्त, अगर तुम दोबारा चलना नहीं शुरू करोगे तो ये लोग तुम्हें गोली मार देंगे.बेहतर होगा की तुम रोज़ मेरे साथ थोड़ा घूमने चलो, थोड़ा जोर लगाओ अपने पैरों पर और दोबारा खड़े होना ही नहीं दौड़ना सीख लो. जिन्दा रहने का यही एक तरीका रहता है.

घोडा मगर तब तक अपने हाल से बेहाल हो चुका था, ठीक होने की आशा छोड़ दी थी उसने. उधर किसान के परिवार ने तय किया की ऐसे घोडा ठीक नहीं हो रहा तो एक बार किसी पशु चकित्सक को बुला कर उसे दिखाते हैं. हम लोगों ने तो बस देसी इलाज़ किया है, शायद चकित्सक कुछ दवाओं से जादू दिखा पाए. अगली सुबह आधे मन से घोड़ा बकरे के साथ टहलने निकला, मुश्किल से लंगड़ाते लंगड़ाते उसने खेतों के एक दो चक्कर लगाये. इतना अच्छा मित्र दिलाने के लिए भगवान् का धन्यवाद करता घोड़ा जैसे ही वापिस आया तो किसान अस्तबल में डॉक्टर के साथ मौजूद था. अब तो घोड़े की हिम्मत भी थोड़ी जाग गई. डॉक्टर ने चोट देखा कुछ दवाइयां और लेप किसान को दिए और महीने भर देख लेने को कह कर चला गया.

अब तो बकरा भी खुश और घोड़े की भी हिम्मत बंधी. किसान की पत्नी लेप लगा जाती, किसान दवाई खिला जाता, और हर सुबह दोगुने जोश के साथ घोड़ा और बकरा चलने का अभ्यास करते. अब किसी किसान का खेत जोतने का साधन न रहे तो बड़ा दुखदायी होता है. किसान के पड़ोसी भी सांत्वना देने और घोड़े को देखने आये. कोई बुढा पड़ोसी भी कुछ जड़ी बूटियां दे गया. हफ्ते भर में थोड़ा सुधार दिखने लगा. अब घोड़े को भी विश्वास हो चला कि वो ठीक हो जायेगा. अगले हफ्ते फिर से डॉक्टर आया, जांच की सुधार देखा और दवाएं जारी रखने की सलाह देकर चला गया. घोडा और बकरा दोनों मित्र रोज़ अभ्यास करते. घोड़े के थकने पर बकरा हिम्मत बंधाता, जोश दिलाता और आगे ले चलता.

दो तीन हफ्ते बीतते बीतते घोड़े की हालत में काफ़ी सुधार हो गया था. अब तो पड़ोसी भी बधाई देने आने लगे. बकरा टेढ़े मेढ़े रास्तों पर चलने में उस्ताद होता है तो वो अब घोड़े के साथ दौड़कर पास की पहाड़ी पर जाने लगा. कड़े से कड़ा अभ्यास करवाता वो घोड़े से. अब घोड़े से मुकाबला करने में बकरे की क्या हालत होती होगी वो तो समझ ही सकते हैं. हाथी कितना भी दुबला हो जाये तो चूहा तो हो नहीं जाता. अभ्यास से लौटने पर बकरा बेचारा थक कर चूर बैठ जाता वहीँ अस्तबल के बाहर. ये देख कर एक दिन किसी पड़ोसी ने लौटते लौटते बकरे की उम्र किसान से पूछ ली. किसान ने जब सोचा तो उसे बकरे की उम्र तो याद नहीं आई, उसने कहा हां थोड़ा बूढ़ा हो गया है बकरा.

महिना बीतते बीतते घोड़ा बिलकुल तंदुरुस्त हो गया और बेचारा बकरा इतना थका हारा होता की वो ज्यादातर वक्त अस्तबल के सामने ही बैठा रहता. किसान और उसका परिवार घोड़े के ठीक हो जाने से बड़ा खुश था, उसके पड़ोसी भी इस बुरे हाल से बाहर आ जाने पर उसे बधाई देते थे. एक दिन किसान और उसकी पत्नी ने सोचा की जिन पड़ोसियों ने हमेशा ऐसे बुरे दिनों में उनका हाल चाल पूछा यथा संभव मदद भी की उनको भी दावत देनी चाहिए. किसान ने अपने सारे पड़ोसियों को दावत पर बुलाया.

अब समस्या थी कि खाने में अच्छा क्या बने तो किसान की पत्नी ने सुझाया, बकरा बूढ़ा हो चला है. कुछ फायदा तो होता नहीं उस से, बेकार मर गया तो नुकसान ही होगा. क्यों न बकरे को ही दावत में परोसा जाए ? किसान और उसका बाकि का परिवार भी इस राय से सहमत हो गया. इस बार बकरा बेचारा थका हारा अस्तबल के बाहर बैठा घोड़े से बातें कर रहा था. किसी ने किसान और उसके परिवार की योजना भी नहीं सुनी. अगली सुबह दावत की तैयारी शुरू होते ही किसान बकरे को घर के पिछवाड़े में ले गया और उसे काट डाला.

घोड़ा दवाइयों से ठीक नहीं हुआ था, बकरे की मेहनत से हुआ था. लेकिन बकरे की गलती ये थी कि वो अपनी कामयाबियों का ढिंढोरा पीटना भूल गया था. तो ज़नाब जितना जरूरी काम करना होता है उतना ही जरूरी काम का ढिंढोरा पीटना भी होता है. अपनी सारी उपलब्धियों को गिनाना शुरू कीजिये या फिर ये याद रखिये की जंगल का सबसे सीधा पेड़ ही सबसे पहले काटा जाता है. टेढ़े मेढ़े पेड़ छोड़ दिए जाते हैं, and it’s a jungle out there !!

अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम है पड़ाव में (बनारस के पास). दुनियाँ के सबसे ज्यादा कुष्ठ रोगियों के सफ़ल इलाज का गिनेस रिकॉर्ड इसी संस्था के नाम है. 1961 से लेकर अबतक 99,045 पूर्ण कुष्ठ रोगियों और 1,47,503 आंशिक कुष्ठ रोगों का इलाज़ ये संस्था कर चुकी है. जैसा कि नाम से ही जाहिर है हिन्दू धार्मिक संगठन है, अगली बार किसी मिशिनरी के सेवा भाव की तारीफ़ के पुल जब आप बाँध रहे हों तो इन्हें भी याद कर लीजियेगा.

अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना भूले हैं बस ! काम ज्यादा ही किया होगा न ?

- आनंद कुमार


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