रौशनी आई बैंक ने क्रेजी ग्रीन के प्रयासों से एक नेत्र चिकित्सालय के रूप में काम करना शुरू कर दिया है. उड़ान की तरह यहाँ भी हजारो नयी कहानियाँ लिखी जायेंगी और ये हस्पताल भी बहुत सी गरीब आँखों को सपने देगा ऐसा विश्वास है. इसे शुरू हुए सिर्फ दस दिन हुए हैं और इन्ही दस दिनों में आज आई एक बूढी महिला ने एक पुरानी कहानी के तार झनझना दिए.

बिना किसी की सहायता के एक अकेली औरत जिसे मुश्किल से दिख रहा है ना जाने कैसे हम तक पहुंची और आकर उसने जब मेरा सहारा लेकर अस्पताल के अन्दर प्रवेश किया तो पता नहीं था कि दिमाग के किस कोने से एक याद की कड़ी को पकड़ कर वो महिला बाहर ले आएगी. डॉक्टर ने उसे देखकर बताया कि उसका मोतियाबिन्द इलाज न होने के कारण आँखों को खराब कर चुका है तो वो महिला रोने लगी कि उसका कोई नहीं है ....

बच्चे उसका ध्यान नहीं रखते और उसको दिखना लगभग ख़तम हो गया है ... उसके रोते रोते मेरे दिमाग में एक दम से रेशम जिन्दा हो गयी. पचास साठ साल की रही होगी रेशम जब वो हमारे एक कैंप में अपनी आँखें दिखाने आई थी. एकदम से खुश, सब औरतो के साथ हंस रही थी ... बार बार कह रही थी अब दिख्खन लगेगा मुझे....

कम से कम दस बार उसने ललित से पूछा होगा की कितनी देर में नंबर आएगा उसका ... और उसके बस थोड़ी देर में कहने के बाद ... उसने हर बार कहा ....हाँ मैं तो दिखा के ही जाउंगी... मुझे कौन सा काम पडा औरते उसे चाच्ची चाच्ची कह के आवाजे लगा रही थी और छेड़ रही थी .... पता नहीं कौन से किस्से उनकी खिलखिलाती हंसी के पीछे दबे पड़े थे ... जब उसका नंबर आया तो उसकी ख़ुशी छलक छलक कर बिखर रही थी ...

अपनी अंधी होती आँखों को दिखाने की ख़ुशी इतनी ज्यादा थी कि देखने के बाद डॉक्टर साहब को साहस नहीं हुआ कि वो उसको बता सके की उसकी आँखों में रौशनी कभी नहीं आएगी .... डॉक्टर के चेहरे पर आई बेहद फीकी बेचारगी ने मेरी धड़कने बढ़ा दी ....

दवाई बाँट रहा था मैं .... उठकर डॉक्टर के पास आया और पूछा .... तो उन्होंने निराशा में सर हिलाया की इलाज ना होने के कारण मोतियाबिन्द ने आँखे ख़तम कर दी .... लेकिन रेशम चहक रही थी .... बताये जा रही थी की उसने जिंदगी में पहली बार अपनी आँखे डॉक्टर को दिखाई .... और दुआएं दिए जा रही थी हम सब लोगो को..... दवाई लेने के समय उसने मुझसे कहा कि अब ठीक हो जायेंगी न मेरी आँखे ..... मेरी आँखे भर आई ... मैंने कहा हाँ ठीक हो जायेगी अम्मा .... खुदा पर भरोसा रख ......

और उसने मेरी तरफ हाथ कर के कहा की अल्लाह तुझे बरकत दे .... पता नहीं रेशम का क्या हुआ होगा ... उस दिन के बाद कई दिनों तक मन बेहद भीगा भीगा रहा ..... आज सलीमा मेरे सामने रो रही है कि कैसे उसकी आँखे बच जाए .... कैसा देश है रे ये पूरे पूरे गाँव अंधे हो रहे हैं ..... किसी को कोई फ़िक्र नहीं .... आज भी मन बेहद मायूस है ..... दिन में कितनी बार आँखों से पानी निकलता रहा ...... समझा रहा हूँ मन को कि आने वाले समय में हम बहुत सी रेश्माओ और सलीमाओ की जिंदगी को रोशन कर सकेंगे .... लेकिन मन है कि मानता नहीं ... आज ये लिखने का भी मन नहीं कर रहा कि दोस्तों आओ ... आगे बढ़ो देश को ... समाज को ... बहुत जरूरत है ... ये कर्ज है हम पर इंसान होने का कि किसी की मदद कर सके ....

- अजय सिंघल (Udaan - Wings of Dreams के संस्थापक )


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