नीमच. चंदेरी का प्रख्यात किला। उसकी सुंदर सी मेहराब बहुत ही नाजुक ढंग से चंदेरी गांव के लोगों ने साड़ी पर उकेर दी। साड़ी भी फूल सी हल्की और मुलायम ऐसी कि अंगूठी में से पूरी साड़ी निकल जाए। अशोकनगर जिले का यह ग्राम चंदेरी साडिय़ों के लिए प्रख्यात है। आमिर खान गांव पहुंचे थे और जो डिजाईन उन्होंने बनाई थी उस करीना डिजाईन की आज भी मांग बनी हुई है। बहुत छोटे-छोटे हेंडलूम पर काम करने वाले शिल्पकार जब चंदेरी साड़ी का ताना-बाना डालते हैं तो आंखे अचरज में पड़ जाती है। रेशम, मसराईज, सूत, जरी, टिशु से चंदेरी की साड़ी जब तैयार होती है तो अपलक नजरें ठहर जाती है। चंदेरी से आए शिल्पकार अबरारखान ने बताया कि कॉटन के बेस पर जबसे चंदेरी की साडी तैयार करने का काम प्रारंभ किया तभी से चंदेरी की साड़ी की मांग बढ़ लगातार बढ़ रही है। इसके बाद तो साडिय़ों में स्कट बॉर्डर, जुगनु बूटी, अषरफी, मोरपंखी, नालफिरमा, जकाट बॉर्डर, झाड़ पल्लू जैसी कई डिजाईन चंदेरी साड़ी पर शिल्पकार उकेरने लगे हैं। दरअसल चंदेरी के किले की जो मेहराब है उसे सबसे पहले साड़ी पर बनाया गया था और उसके बाद तो साड़ी की ख्याति ऐसी हुई कि अब यह चंदेरी के नाम से विख्यात हो गई है। साड़ी का वजन इतना कम होता है कि हर महिला के लिए इसे संभालना आसान है। 120 ग्राम से लेकर 300 ग्राम वजन की साडिय़ों में कई आकर्षक और चटक रंग बरबस ही आकर्षित करते हैं। साडिय़ों की डिजाईन में एक पहले और जोड़ा गया है। जिसमें चंदेरी के किले और खजूर के पेड़ के बीच से सूरज का जो दृश्य बनता है उसे भी साडिय़ों पर उकेर दिया है। श्री खान ने बताया कि पहले चंदेरी साड़ी को लेकर जो कुछ कमियां थी वे सभी अब समाप्त हो गई है। अब साडिय़ों को फोल्ड करके रखने पर उनमें कट लगने का डर नहीं रहता है। श्री खान का कहना है कि मृगनयनी से जुडऩे के बाद इस काम को ज्यादा प्रगति मिली है। श्री खान ने बताया कि कामन वेल्थ गेम्स में मेडल विजेता को दिए जाने वाले स्टोल चंदेरी में ही तैयार किए गए थे। इस बात से चंदेरी की साड़ी के महत्व को आसानी से समझा जा सकता है। श्री खान ने बताया कि आज भी भारत में चंदेरी की साड़ी की इतनी मांग है कि उसकी पूर्ति नहीं हो पाती है। चंदेरी की साडिय़ां 1600 से 40 हजार रुपए तक है। इसके बाद भी इसकी बिक्री में कीमत को लेकर कोई दिक्कत नहीं होती है। भारत के महानगरों में सभी जगह इसकी मांग की जाती है। उन्होंने बताया कि विवाह समारोह के लिए विशेष तौर पर महालक्ष्मी साड़ी तैयार की जाती है। यह साड़ी देखते ही पहली नजर में ग्राहक पसंद कर लेता है। लेदर में टाटा एक्सपोर्ट देवास का नाम जाना-पहचाना है। टाटा एक्सपोर्ट अपने उत्पाद बनाने के बाद शेष मटेरियल को वह शिल्पकारों को दे देता है। शिल्पकार उस मटेरियल का जिस कलात्मक ढंग से उपयोग करते हैं वह अदभुत है। छोटे से कॉइन बेग से लेकर एयर बेग को जोड़कर तैयार करने वाले ओमप्रकाश गुजराती ने बताया कि इस प्रकार बनने वाली लेदर सामग्री किसी भी प्रकार से टाटा की गुणवत्ता से कम नहीं होती है बल्कि टाटा के आयटम की तुलना में कीमत बहुत ही कम होती है। दिखने में भी इस सामग्री में कोई कमी नहीं होती है। श्री गुजराती इस काम से अन्य लोगों को भी जोडऩे का काम कर रहे हैं। उन्होंने कई महिलाओं को लेदर शिल्प सिखाया है और उन्हें रोजगार मुहैया कराया है। श्री गुजराती ने बताया कि लेदर सामग्री बनाने में उन्हें महारथ हासिल है जिससे उन्हें कई सरकार संस्थानों ने मास्टर ट्रेनर बनाया है। उनके कार्य तथा उनकी सामग्री के विक्रय के चलते उन्हें विज्ञान भवन भोपाल में प्रशासन ने सम्मानित भी किया है। श्री गुजराती के अनुसार नीमच टाउन हाल की प्रदर्शनी में उन्होंने नई सामग्री उपलब्ध कराई है। यहां के कला प्रेमी लोगो का रूझान कला के प्रति अच्छा है। यही कारण है कि उन्हें अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है।



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