जिस तरह से बैगा आदिवासी तीज-त्योहार व उत्सवों पर रंग-बिरंगी पोषाकों में आकर्षित करते हैं वैसे ही उनकी अनोखी बेंवर खेती मोहित करती है. रंग-बिरंगे छोटे-बड़े दानों वाले देशी बीज, खेत में लहलहाती हरी-भरी फसलें , मोतियों से दाने वाले चमकीले भुट्टे, भरी बालियां और झुमके सी लटकती फलियां. अगर कवि दृष्टि से देखें तो निहारते ही रहो. बहुत ही मनमोहक दृश्य. अपूर्व सौंदर्य से भरपूर इस अनूठी खेती का खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा जैव विविधता, मौसम बदलाव, पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से काफी महत्व है. मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले के बैगा आदिवासी पीढ़ियों से बेंवर झूम खेती करते आ रहे हैं. सतपुड़ा की मैकल पहाड़ियों में बसे और आदिम जनजाति में शुमार बैगा आदिवासियों का जंगल से गहरा लगाव है. उनकी आजीविका व जीवनशैली जंगल आधारित है.

बेंवर खेती पूरी तरह से जैविक, पारिस्थितिक, प्रकृति के अनुकुल और मिश्रित खेती है. इसकी खासियत यह है कि इस खेती में एक साथ 16 प्रकार के बीजों का इस्तेमाल किया जाता है, उनमें कुछ बीज अधिक पानी में अच्छी फसल देता है, तो कुछ बीज कम पानी होने या सूखा पड़ने पर भी अच्छा उत्पादन करता है. इससे खेत में हमेशा कोई-न-कोई फसल लहलहाते रहता है. इससे किसानों के परिवार को भूखे मरने की नौबत भी नहीं आती और न ही किसान को आत्महत्या करने की स्थिति उत्पन्न होती है. फिलहाल इस तरह की खेती पर रोक लगी हुई है. सन् 1864 में अंग्रेजों के वन कानून ने इस पर रोक लगा दी है. उसके बाद भी डिंडौरी जिले के बैगाचक और बैगाचक से लगे छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में कुछ बैगा जनजाति बेंवर खेती को अपनाए हुए है. सरकार को चाहिए की इसे बढ़ावा दे और इससे शहरी किसानों को भी जोड़े.

देखा जाए तो हम लोग ज्यों-ज्यों विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं, हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को पीछे छोड़ते जा रहे हैं. हमने वर्ष 1966-67 में हरित क्रांति का आगाज तो किया, लेकिन अंधाधुंध रसायनों और कीटनाशकों का उपयोग करके. जिसका परिणाम आज फलों व सब्जियों में जहर के रूप में सामने आ रहा है. मौजूदा समय में जरूरत है तो इस रसायनिक खेती के बेहतर विकल्प तलाशने की और वह जैविक खेती के रूप में सामने आ रहा है. अर्थात फिर से प्राकृतिक तरीके से खाद तैयार कर खेती करना. लेकिन हम आदिवासियों की बेंवर खेती को क्यों भूल रहे हैं, जिसमें खेती करने के लिए न तो किसी प्रकार की खाद व दवाई की आवश्यकता पड़ती है और न ही सिंचाई करने के लिए पानी और हल से जोत की जरूरत. उसके बावजूद इसमें बम्पर पैदावार होती है. विशेषकर यह पहाड़ी इलाकों के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर सकता है.

रसायनिक खेती के जहां ज्यादा नुकसान हैं, वहीं बेंवर खेती के कई फायदे हैं. बिना हल चलाए खेती करने से पहाड़ अथवा ढ़लान की मिट्टी के कटाव को रोका जाता है. इसके खेत तैयार करने के लिए न तो पेड़ों को काटा जाता है और न ही जमीन जोती जाती है. इसकी सिंचाई व इसमें खाद डालने के लिए किसानों को सोचना भी नहीं पड़ता है. यह पूरी तरह बारिश पर निर्भर है. इसलिए इस तरह की खेती पहाड़ी इलाकों में ज्यादा सुरक्षित है, जहां बारिश समय पर होती है.

आज भी इस तरह की खेती आदिवासी इलाकों में होती है. यह जैविक खेती का ही एक रूप है. डिंडौरी जिले के समनापुर विकासखंड के कई गांवों में बैगा आदिवासी इस तरह की खेती करके अनाज का उत्पादन करते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं.