देहरादून. उत्तराखंड में बरपे कुदरत के कहर की हर रोज नई दर्दनाक कहानियां सामने आ रही हैं. जैसे-जैसे लोग बचकर ऋषिकेश, देहरादून और अपने घर पहुंच रहे हैं, दर्द की दास्तां उनकी जुबां से फूट रही हैं.

केदारनाथ में आई तबाही उत्तराखंड के एक सीमांत गांव पर बड़ी भारी गुजरी है. इसने गांव की सारी महिलाओं को ही विधवा कर दिया है. मंदिर में पूजा कराने वाले पंडितों के ऊखीमठ के पास स्थित बामणी गांव की लगभग सारी महिलाएं केदारनाथ हादसे में विधवा हो गई हैं. हादसे में बाल-बाल बचीं नैनीताल की बसंती देवी व वैजयंती जोशी नाम की दो महिलाओं ने एक अखबार को बताया कि वे चार दिन तक केदारघाटी के एक गांव में फंसी रहीं. वहां पता चला कि पास के बामणी गांव के पुरुष केदारनाथ में पूजापाठ और कर्मकांड कराते हैं. इस समय गांव के सारे पुरुष अपने पुत्रों सहित केदारनाथ में थे. गांव में केवल महिलाएं और लड़कियां थीं. सारे पंडित हादसे में मारे गए हैं

पति ने बांहों में तोड़ा दमः देहरादून के जौली ग्रांट स्थित हिमालय हॉस्पिटल में भर्ती जोधपुर की अरुणा पवार की है. तबाही वाली रात अरुणा अपने डायबिटिक पेशंट पति चंद्रकांत पवार और सहेली हेमलता के साथ रामबाड़ा में फंस गई थीं. तीनों तीन दिन तक भारी बारिश में वहां फंसे रहे. खाना न मिलने के कारण उनके पति की हालत बिगड़ गई और उन्होंने दम तोड़ दिया. सेना के बचाव अभियान में दोनों को किसी तरह वहां से निकालकर देहरादून लाया गया.

फिर नहीं जाएंगे उत्तराखंड: 15 जून को पुणे के दो परिवार टिहरी गढ़वाल स्थित यमुनोत्री (यमुना नदी का उद्गम) के दर्शन के लिए पहुंचे थे. यहां के दृश्यों ने गुप्ता और देओलेकर परिवार का मन कुछ यूं मोहा कि उन्होंने खुद से वादा किया कि वह अब हर साल आएंगे. लेकिन इलाके में आई भीषण बाढ़ अपने साथ सब कुछ बहा कर ले गई, इन दो परिवारों के खुद से किए गए उस वादे को भी.

बालकृष्ण गुप्ता के अनुसार यमुनोत्री जाकर हमारा परिवार बहुत खुश था, लेकिन उसी दिन दोपहर 2 बजे के आसपास पूरा उत्तराखंड बाढ़ की आगोश में समा गया और हर वो चीज तबाह हो गई, जो हरी-भरी और खूबसूरत थी. बालकृष्ण की पत्नी सविता ने बताया कि बीते 5 दिन में जो कुछ भी हुआ, उसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि हम वहां फिर जाने को कभी सोचेंगे भी नहीं .

चाय वाले का शुक्रगुजार: धनंजय देओलेकर ने बताया कि हमने सूरी से सटे खरसंबाई गांव के करीब सड़क किनारे बने एक टी स्टॉल में 5 दिन बिताए. वहां बारिश काफी तेज हो रही थी और हमारे पास इससे बचने के लिए केवल प्लास्टिक शीट्स थीं. हम उस चाय बेचने वाले के शुक्रगुजार हैं. उसने हमें खाना दिया. और तो और, वहां सड़क पर बने ऐसे तमाम खोमचे हर दिन हम जैसे 200 से ज्यादा टूरिस्टों की सेवा कर रहे थे.

पत्तियां और जड़ों को खा कर रहे जिंदा: कर्नाटक की पूर्व मंत्री शोभा करांदलाजे तबाही के दौरान रुदप्रयाग में थीं. जब आसपास खाने-पीने को कुछ नहीं मिला था तो उन्होंने घासफूस, पत्तियां और पेड़ों की जड़ें खाकर खुद को जिंदा रखा. शोभा बताती हैं कि मूसलाधार बारिश और भूस्खलन की वजह से वह रुदप्रयाग के पास बुडमा नाम के गांव में फंस गई थीं. उनके साथ और भी कई लोग यहां फंसे पड़े थे. बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं था और किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था.

ने बताया कि मैंने उस दौरान जो देखा, उससे पहले सिर्फ हॉलिवुड की फिल्मों में ही देखा था. बाढ़ अपने साथ बडे़-बडे़ पेड़, गाडि़यां और जो कुछ रास्ते में आ रहा था, उसे बहाकर ले जा रही थी. हमें इंतजार था कि राहत और बचाव में लगे लोग आएंगे, लेकिन हर तरफ कीचड़, चट्टानों और पानी के सिवा कुछ नहीं था. अगले तीन दिन हमने खुले आसमान में बिताए. पहले दिन हमने मंदिरों से मिले प्रसाद और बिस्किट खाए. लेकिन जब वे खत्म हो गए तो खाने को कुछ नहीं था. कुछ गांववालों ने हमें वैसे पौधे और घासफूस दिखाए, जिन्हें खाया जा सकता था. हमारे पास और कोई चारा नहीं था और खुद को जिंदा रखने के लिए हमने इन पौधों, पत्तियों और पेड़ों की जड़ों का सहारा लिया.

कुछ दुकानदार ने उठाया मौके का फायदा: धनंजय की पत्नी प्रीति ने बताया कि कुछ दुकानदार ने हालात का फायदा उठाते हुए ऊंची कीमत पर खाने-पीने के सामान बेचे. हालत यह थी कि एक-एक आलू परांठा 50-50 रुपये में बिक रहा था.